भारत के स्वतंत्रता संग्राम में सुभाष चंद्र बोस की भूमिका (Role of Subhash Chandra Bose in India's Freedom Struggle)

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में सुभाष चंद्र बोस का स्थान अत्यंत विशिष्ट और निर्णायक है। वे उन क्रांतिकारी नेताओं में अग्रणी थे जिन्होंने केवल राजनीतिक संघर्ष ही नहीं किया, बल्कि सशस्त्र प्रतिरोध के माध्यम से भी अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद को सीधी चुनौती दी। ‘नेताजी’ के नाम से विख्यात बोस असाधारण नेतृत्व क्षमता, ओजस्वी वक्तृत्व और अदम्य साहस के प्रतीक थे। उनका जीवन पूर्णतः राष्ट्र को समर्पित था।

प्रारंभिक राजनीतिक जीवन और कांग्रेस में भूमिका

सुभाष चंद्र बोस ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत देशबंधु चित्तरंजन दास के सान्निध्य में की। वे उनके निकट सहयोगी रहे और ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी के कारण उनके साथ जेल भी गए। जब सी.आर. दास को कोलकाता का मेयर चुना गया, तब उन्होंने बोस को नगर प्रशासन का मुख्य कार्यकारी अधिकारी नियुक्त किया। यह नियुक्ति बोस की प्रशासनिक दक्षता और संगठन क्षमता का प्रमाण थी।


वर्ष 1924 में ब्रिटिश सरकार ने उनकी तीव्र राष्ट्रवादी गतिविधियों के कारण उन्हें गिरफ्तार कर लिया।

युवाओं और श्रमिक वर्ग का संगठन

सुभाष चंद्र बोस ने विशेष रूप से युवाओं और श्रमिक वर्ग को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ने पर बल दिया। उन्होंने ट्रेड यूनियन आंदोलन को सशक्त किया और मजदूरों को संगठित कर राष्ट्रीय संघर्ष से जोड़ा। इसी क्रम में वर्ष 1930 में उन्हें कोलकाता का मेयर चुना गया तथा उसी वर्ष वे अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस के अध्यक्ष भी बने। इससे यह स्पष्ट हुआ कि बोस केवल राजनीतिक नेता नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक न्याय के भी प्रबल समर्थक थे।

पूर्ण स्वराज और वामपंथी विचारधारा

नेताजी बिना किसी शर्त के पूर्ण स्वराज के समर्थक थे। उन्होंने मोतीलाल नेहरू रिपोर्ट का विरोध किया, जिसमें भारत के लिए केवल डोमिनियन स्टेटस की मांग की गई थी। 1930 के दशक में वे जवाहरलाल नेहरू और एम.एन. रॉय के साथ कांग्रेस की वामपंथी धारा से जुड़े रहे।
नमक सत्याग्रह (1930) में उनकी सक्रिय भूमिका रही और 1931 में सविनय अवज्ञा आंदोलन के निलंबन तथा गांधी–इरविन समझौते का उन्होंने खुलकर विरोध किया।

कराची प्रस्ताव और समाजवादी दृष्टि

वामपंथी नेताओं के प्रयासों से 1931 में कराची अधिवेशन में कांग्रेस ने ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित किए, जिनमें मौलिक अधिकारों की गारंटी के साथ-साथ उत्पादन के साधनों के समाजीकरण पर बल दिया गया। इन प्रस्तावों के पीछे बोस जैसे नेताओं की वैचारिक प्रेरणा स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

कांग्रेस अध्यक्षता और फॉरवर्ड ब्लॉक

वर्ष 1938 में हरिपुरा अधिवेशन में सुभाष चंद्र बोस कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए। अगले वर्ष त्रिपुरी अधिवेशन में उन्होंने गांधी जी के समर्थित उम्मीदवार पट्टाभि सीतारमैया को पराजित कर पुनः अध्यक्ष पद जीता।
किन्तु गांधी जी से वैचारिक मतभेद गहराने के कारण बोस ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया और फॉरवर्ड ब्लॉक नामक नए राजनीतिक दल की स्थापना की। इसका उद्देश्य विशेषकर बंगाल में वामपंथी राष्ट्रवादी शक्तियों को संगठित करना था।

द्वितीय विश्व युद्ध और अंतरराष्ट्रीय प्रयास

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लेने के कारण अंग्रेज़ों ने उन्हें पुनः गिरफ्तार कर कोलकाता में नज़रबंद कर दिया। वहाँ से वे साहसिक ढंग से निकलकर जर्मनी पहुँचे।
बर्लिन में उन्होंने फ्री इंडिया सेंटर की स्थापना की और युद्ध में बंदी बनाए गए भारतीय सैनिकों को संगठित कर एक सैन्य शक्ति खड़ी करने का प्रयास किया। इसी क्रम में उन्होंने हिटलर और मुसोलिनी से भारत की स्वतंत्रता के लिए समर्थन माँगा—यह कदम उनकी व्यावहारिक और वैश्विक रणनीति को दर्शाता है।

आज़ाद हिंद सरकार और INA

जुलाई 1943 में नेताजी जर्मनी से जापान-नियंत्रित सिंगापुर पहुँचे। वहीं से उन्होंने अपना ऐतिहासिक नारा “दिल्ली चलो” दिया।
21 अक्टूबर 1943 को उन्होंने आज़ाद हिंद सरकार की स्थापना और भारतीय राष्ट्रीय सेना (INA) के पुनर्गठन की घोषणा की। INA का प्रारंभिक गठन मोहन सिंह और जापानी अधिकारी फुजिवारा के नेतृत्व में हुआ था, जिसे नेताजी ने एक शक्तिशाली क्रांतिकारी सेना का रूप दिया।

आज़ाद हिंद रेडियो और राष्ट्रपिता संबोधन

नेताजी के नेतृत्व में जर्मनी में आज़ाद हिंद रेडियो की शुरुआत हुई। इसका उद्देश्य भारतीयों में स्वतंत्रता की चेतना को प्रखर करना था। 6 जुलाई 1944 को इसी रेडियो से प्रसारित अपने ऐतिहासिक संबोधन में सुभाष चंद्र बोस ने महात्मा गांधी को पहली बार “राष्ट्रपिता” कहकर संबोधित किया।

वैश्विक प्रभाव और ऐतिहासिक विरासत

सुभाष चंद्र बोस का स्वतंत्रता संग्राम केवल भारत तक सीमित नहीं रहा। उनके विचारों और संघर्ष ने एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के अनेक उपनिवेशित देशों को प्रेरित किया। वे तीसरी दुनिया के देशों के लिए स्वतंत्रता, आत्मसम्मान और साहस के प्रतीक बने।
नेताजी का जीवन यह संदेश देता है कि स्वतंत्रता केवल मांगने से नहीं, बल्कि त्याग, संगठन और अदम्य संकल्प से प्राप्त होती है। इसी कारण सुभाष चंद्र बोस इतिहास में सदैव “विश्वस्तरीय स्वतंत्रता नायक” के रूप में स्मरण किए जाते रहेंगे।


G D Pandey