भारत के स्वतंत्रता संग्राम में सुभाष चंद्र बोस की भूमिका (Role of Subhash Chandra Bose in India's Freedom Struggle)

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में सुभाष चंद्र बोस का स्थान अत्यंत विशिष्ट और निर्णायक है। वे उन क्रांतिकारी नेताओं में अग्रणी थे जिन्होंने केवल राजनीतिक संघर्ष ही नहीं किया, बल्कि सशस्त्र प्रतिरोध के माध्यम से भी अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद को सीधी चुनौती दी। ‘नेताजी’ के नाम से विख्यात बोस असाधारण नेतृत्व क्षमता, ओजस्वी वक्तृत्व और अदम्य साहस के प्रतीक थे। उनका जीवन पूर्णतः राष्ट्र को समर्पित था।

प्रारंभिक राजनीतिक जीवन और कांग्रेस में भूमिका

सुभाष चंद्र बोस ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत देशबंधु चित्तरंजन दास के सान्निध्य में की। वे उनके निकट सहयोगी रहे और ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी के कारण उनके साथ जेल भी गए। जब सी.आर. दास को कोलकाता का मेयर चुना गया, तब उन्होंने बोस को नगर प्रशासन का मुख्य कार्यकारी अधिकारी नियुक्त किया। यह नियुक्ति बोस की प्रशासनिक दक्षता और संगठन क्षमता का प्रमाण थी।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस (Netaji Subhash Chandra Bose) की कुछ यादें



· नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 125वीं जयंति की वर्षगांठ पर भारत सरकार ने नेताजी के जन्मदिवस को पराक्रम दिवस) के रूप में मनाने का फैसला किया है। 

आजादी के 78 साल - कितना बदला भारत

दोस्तों,
ज़रा आँखें बंद कीजिए और दिल से उस पल की कल्पना कीजिए — बाहर अँधेरा, पर भीतर भारत के प्रत्येक घर में उजाला। 15 अगस्त 1947 की रात वो थी,  हर चीख, हर उम्मीद, हर तड़प को एक जोश में बदल रहा था। वह सिर्फ स्वतंत्रता का जश्न नहीं था, हजारों साल के उजाड़ से निकली एक नई सुबह का पैगाम था।
15 अगस्त 1947 की वह ऐतिहासिक रात… दिल्ली का पथ पत्थर कम थे, लेकिन आत्माओं में जो चमक थी, वह आज भी किसी दीपक से कम नहीं।
जवाहरलाल नेहरू ने कहा:
"At the stroke of the midnight hour, when the world sleeps, India will awake to life and freedom."
और हकीकत में, यह किसी राष्ट्र का जन्म नहीं था—यह लाखों सपनों का, एक नए भारत का पुनर्जन्म था।

"भारत: कर्जन से नेहरू तक" प्रसिद्ध पत्रकार दुर्गादास के नजरिए से

"भारत: कर्जन से नेहरू तक" प्रसिद्ध पत्रकार दुर्गादास के नजरिए से

भारत के आधुनिक इतिहास में केवल तिथियाँ, व्यक्तियों या संतों की सूची नहीं है, बल्कि यह उन व्यक्तियों की भी दास्तां है, युद्ध में इस देश की आत्मा को गढ़ा और बदला गया है। यदि  कर्ज़न को ब्रिटिश साम्राज्य के कट्टर प्रतिद्वंद्वी का प्रतिनिधि माना जाए, तो नेहरू को स्वतंत्र भारत के स्वप्निल शिल्पकार माने जाते हैं। ये दोनों विशेषण दो अलग-अलग युगों के प्रतीक हैं ।

पंद्रह अगस्त 1947 की सुबह का अखबार


पंद्रह अगस्त 1947 की सुबह का अखबार

यह तस्वीर भगत सिंह , राजगुरू, सुखदेव के अन्तिम संस्कार की है.




Source - Facebook Post

भगत सिंह के फासी के 3 घंटे पहले का ऐतिहासिक किस्सा


23 मार्च का दिन उन आम दिनों की तरह ही शुरू हुआ जब सुबह के समय राजनीतिक बंदियों को उनके बैरक से बाहर निकाला जाता था। आम तौर पर वे दिन भर बाहर रहते थे और सूरज ढलने के बाद वापस अपने बैरकों में चले जाते थे। लेकिन आज वार्डन चरत सिंह शाम करीब चार बजे ही सभी कैदियों को अंदर जाने को कह रहा था। सभी हैरान थे, आज इतनी जल्दी क्यों। पहले तो वार्डन की डांट के बावजूद सूर्यास्त के काफी देर बाद तक वे बाहर रहते थे। लेकिन आज वह आवाज काफी कठोर और दृढ़ थी। उन्होंने यह नहीं बताया कि क्यों? बस इतना कहा, ऊपर से ऑर्डर है।