भगत सिंह: जीवन, विचार, क्रांति और शहादत | Shaheed Bhagat Singh Biography in Hindi

 

भगत सिंह: विचार, संघर्ष और शहादत

एक ऐसा जीवन जो आज भी सवाल पूछता है

28 सितंबर — शहीद-ए-आज़म भगत सिंह जयंती

भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल युद्धों, आंदोलनों और राजनीतिक समझौतों का इतिहास नहीं है। यह उन असंख्य युवाओं की कहानी भी है जिन्होंने अपने जीवन के सबसे सुंदर वर्षों को देश की स्वतंत्रता के नाम कर दिया।

इन युवाओं में भगत सिंह का स्थान विशेष है।

उनका नाम आते ही हमारे सामने एक युवा चेहरा उभरता है—सिर पर टोपी, चेहरे पर आत्मविश्वास और आँखों में एक ऐसा संकल्प, जिसने ब्रिटिश साम्राज्य की विशाल सत्ता के सामने भी झुकना स्वीकार नहीं किया।

लेकिन भगत सिंह को केवल एक साहसी क्रांतिकारी के रूप में देखना उनके व्यक्तित्व को छोटा कर देना होगा।

वे केवल बंदूक और बम की भाषा समझने वाले युवक नहीं थे। वे गंभीर पाठक, लेखक, पत्रकार, राजनीतिक विचारक और सामाजिक परिवर्तन के समर्थक भी थे। जेल में रहते हुए भी वे किताबें मँगवाते थे, नोट्स बनाते थे और राजनीति, इतिहास, अर्थशास्त्र, दर्शन तथा समाज के प्रश्नों पर विचार करते थे। भारत सरकार के अभिलेखीय विवरण के अनुसार उनकी जेल नोटबुक में रूसो, वोल्तेयर, थॉमस पेन, बर्ट्रेंड रसेल, टॉल्स्टॉय, मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन और ट्रॉट्स्की सहित अनेक लेखकों और विचारकों के संदर्भ मिलते हैं।

इसलिए भगत सिंह की कहानी केवल शहादत की कहानी नहीं, बल्कि विचार से कर्म और कर्म से बलिदान तक की यात्रा है।

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में सुभाष चंद्र बोस की भूमिका (Role of Subhash Chandra Bose in India's Freedom Struggle)

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में सुभाष चंद्र बोस का स्थान अत्यंत विशिष्ट और निर्णायक है। वे उन क्रांतिकारी नेताओं में अग्रणी थे जिन्होंने केवल राजनीतिक संघर्ष ही नहीं किया, बल्कि सशस्त्र प्रतिरोध के माध्यम से भी अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद को सीधी चुनौती दी। ‘नेताजी’ के नाम से विख्यात बोस असाधारण नेतृत्व क्षमता, ओजस्वी वक्तृत्व और अदम्य साहस के प्रतीक थे। उनका जीवन पूर्णतः राष्ट्र को समर्पित था।

प्रारंभिक राजनीतिक जीवन और कांग्रेस में भूमिका

सुभाष चंद्र बोस ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत देशबंधु चित्तरंजन दास के सान्निध्य में की। वे उनके निकट सहयोगी रहे और ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी के कारण उनके साथ जेल भी गए। जब सी.आर. दास को कोलकाता का मेयर चुना गया, तब उन्होंने बोस को नगर प्रशासन का मुख्य कार्यकारी अधिकारी नियुक्त किया। यह नियुक्ति बोस की प्रशासनिक दक्षता और संगठन क्षमता का प्रमाण थी।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस (Netaji Subhash Chandra Bose) की कुछ यादें



· नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 125वीं जयंति की वर्षगांठ पर भारत सरकार ने नेताजी के जन्मदिवस को पराक्रम दिवस) के रूप में मनाने का फैसला किया है। 

आजादी के 78 साल - कितना बदला भारत

दोस्तों,
ज़रा आँखें बंद कीजिए और दिल से उस पल की कल्पना कीजिए — बाहर अँधेरा, पर भीतर भारत के प्रत्येक घर में उजाला। 15 अगस्त 1947 की रात वो थी,  हर चीख, हर उम्मीद, हर तड़प को एक जोश में बदल रहा था। वह सिर्फ स्वतंत्रता का जश्न नहीं था, हजारों साल के उजाड़ से निकली एक नई सुबह का पैगाम था।
15 अगस्त 1947 की वह ऐतिहासिक रात… दिल्ली का पथ पत्थर कम थे, लेकिन आत्माओं में जो चमक थी, वह आज भी किसी दीपक से कम नहीं।
जवाहरलाल नेहरू ने कहा:
"At the stroke of the midnight hour, when the world sleeps, India will awake to life and freedom."
और हकीकत में, यह किसी राष्ट्र का जन्म नहीं था—यह लाखों सपनों का, एक नए भारत का पुनर्जन्म था।

"भारत: कर्जन से नेहरू तक" प्रसिद्ध पत्रकार दुर्गादास के नजरिए से

"भारत: कर्जन से नेहरू तक" प्रसिद्ध पत्रकार दुर्गादास के नजरिए से

भारत के आधुनिक इतिहास में केवल तिथियाँ, व्यक्तियों या संतों की सूची नहीं है, बल्कि यह उन व्यक्तियों की भी दास्तां है, युद्ध में इस देश की आत्मा को गढ़ा और बदला गया है। यदि  कर्ज़न को ब्रिटिश साम्राज्य के कट्टर प्रतिद्वंद्वी का प्रतिनिधि माना जाए, तो नेहरू को स्वतंत्र भारत के स्वप्निल शिल्पकार माने जाते हैं। ये दोनों विशेषण दो अलग-अलग युगों के प्रतीक हैं ।